बांसवाड़ा की बात चलते ही माही नदी, हरियाली और आदिवासी संस्कृति याद आती है। लेकिन इसी इलाके में एक ऐसी धरोहर भी है, जहाँ पत्थरों की कारीगरी देखकर कदम अपने आप रुक जाते हैं। यह जगह है आर्थूना। यहाँ बचे मंदिर, नक्काशीदार खंभे और मूर्तियाँ बताते हैं कि वागड़ के कारीगर अपने काम में कितने माहिर थे। पहली नजर में इन्हें खंडहर कह देना आसान है, मगर थोड़ा ध्यान से देखें तो इनमें एक पुराने नगर की पहचान दिखाई देती है।
आर्थूना का इतिहास और वागड़ से रिश्ता

आर्थूना राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित है। इसका पुराना नाम उत्थूनक बताया गया है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के विवरण के अनुसार, ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में यह वागड़ के परमार शासकों की राजधानी थी। इसलिए इसकी पहचान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं थी। सत्ता और धार्मिक संरक्षण से जुड़ा यह स्थान उस दौर के क्षेत्रीय इतिहास को समझने में भी अहम है। आज के शांत आर्थूना और उसके पुराने महत्व के बीच का फर्क ही यहाँ आने की उत्सुकता बढ़ाता है।
यहाँ के इतिहास में मंडलेश्वर शिव मंदिर का खास स्थान है। अभिलेख के आधार पर इसका निर्माण 1079 ईस्वी में परमार शासक चामुंडराज ने अपने पिता की स्मृति में करवाया था। ऐसी जानकारी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे मंदिर की कहानी केवल सुनी-सुनाई बात नहीं रहती। निर्माण का समय और उससे जुड़े व्यक्ति की पहचान मिलने पर इतिहास की एक ठोस कड़ी सामने आती है। आर्थूना को समझने में इन शिलालेखों की भूमिका उतनी ही जरूरी है, जितनी इसकी सुंदर नक्काशी की।
आर्थूना के मंदिरों में क्या खास है?

आर्थूना में अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़े मंदिरों के अवशेष मिलते हैं। पुरातात्त्विक विवरणों में शिव और जैन मंदिरों के साथ विष्णु तथा हनुमान मंदिरों का भी उल्लेख है। हनुमानगढ़ी नाम से पहचाने जाने वाले समूह में नीलकंठ महादेव मंदिर, छोटे देवालय और सीढ़ियों वाला कुंड बताया गया है। इतने प्रकार के निर्माण यह संकेत देते हैं कि यहाँ धार्मिक गतिविधियाँ किसी एक मंदिर तक सीमित नहीं थीं। इस जगह को पूरे मंदिर समूह के रूप में देखना ज्यादा उपयोगी है।
मंडलेश्वर मंदिर के तराशे हुए खंभे और मूर्तिकला इसकी खास पहचान हैं। इन्हें देखने का अच्छा तरीका है कि जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने के बजाय किसी एक हिस्से पर नजर टिकाएँ। आकृतियों की बारीकी और सजावट में लगा श्रम तब ज्यादा साफ दिखाई देता है। मंदिर का बचा हिस्सा भी यह एहसास करा देता है कि निर्माण के समय सुंदरता पर कितना ध्यान दिया गया होगा। आर्थूना के प्राचीन मंदिर इसी वजह से इतिहास और कला में रुचि रखने वालों को आकर्षित करते हैं।
बिना आधुनिक मशीनों के कैसे बने होंगे मंदिर?

पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी देखकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि उस समय यह काम कैसे हुआ होगा। इसका जवाब तलाशते हुए सावधानी जरूरी है। आर्थूना में इस्तेमाल हुए हर औजार, पत्थर ढोने के तरीके या निर्माण व्यवस्था की पूरी जानकारी यहाँ दिए गए स्रोतों से नहीं मिलती। इसलिए किसी खास तकनीक को पक्का सच मान लेना ठीक नहीं होगा। पुराने कारीगरों के हुनर की तारीफ करने के लिए कोई चमत्कारी कहानी जोड़ना भी जरूरी नहीं है।
सामान्य तौर पर पत्थर का निर्माण सही माप, आकार, आधार और वजन के संतुलन पर निर्भर करता है। लेकिन आर्थूना के किसी विशेष हिस्से को कैसे बनाया गया, यह जानने के लिए उसके जोड़, बनावट और औजारों के निशानों का अध्ययन चाहिए। यही फर्क अनुमान और प्रमाण के बीच होता है। एक सुंदर खंभा हमें कारीगर की क्षमता दिखाता है; उसकी निर्माण प्रक्रिया समझने के लिए अलग जाँच करनी पड़ती है।
मूर्तियाँ भी इतिहास का सुराग हैं

मंदिर की मूर्ति को देखते समय हमारा ध्यान पहले उसकी धार्मिक पहचान पर जाता है। लेकिन उसके वस्त्र, आभूषण, केश सज्जा और मुद्रा भी देखने लायक होते हैं। ये विवरण तत्कालीन कला और सांस्कृतिक धारणाओं को समझने में मदद कर सकते हैं। फिर भी हर आकृति को आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन की हूबहू तस्वीर मानना सही नहीं होगा। धार्मिक कला में आदर्श रूप और परंपरागत कल्पनाएँ भी शामिल रहती हैं। इसलिए मूर्तियों को दूसरे ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ पढ़ना जरूरी है।
आर्थूना खंडहर क्यों बना?
आज टूटे मंदिर देखकर मन में यही सवाल आता है कि इतना महत्वपूर्ण स्थान इस हालत में कैसे पहुँचा। उपलब्ध विवरणों से पूरे मंदिर समूह के पतन का कोई एक निर्णायक कारण तय नहीं होता। राजनीतिक बदलाव, संरक्षण में कमी या लंबे समय तक रखरखाव न होना जाँच के विषय हो सकते हैं, मगर इन्हें आर्थूना के प्रमाणित कारण कहना जल्दबाजी होगी। इसी तरह हर टूटे पत्थर को किसी एक हमले या अचानक हुई घटना से जोड़ना भी सही निष्कर्ष नहीं है।
इस धरोहर को देखने का सही नजरिया
आर्थूना जाएँ तो केवल तस्वीर लेकर लौटने की जल्दी न करें। खंभों, मूर्तियों और मंदिरों की बनावट को थोड़ा समय दें। नक्काशी पर नाम लिखने, पत्थरों पर चढ़ने या किसी टुकड़े को उठाकर ले जाने से बचें। स्थानीय लोगों की बातें इस जगह से परिचय कराती हैं, जबकि ऐतिहासिक दावों की पुष्टि अभिलेखों और पुरातात्त्विक अध्ययन से होती है। आर्थूना की असली खूबसूरती यही है कि यहाँ आस्था, कारीगरी और वागड़ का इतिहास एक साथ दिखाई देते हैं।
