घूमने का मन हो और अपनी कार न हो, तो अक्सर प्लान आगे टल जाता है। लेकिन झालावाड़ की दो दिन की यात्रा के लिए कार जरूरी नहीं है। बस या ट्रेन से शहर पहुँचकर, आगे का सफर ऑटो और पैदल घूमने के हिसाब से रखा जा सकता है। हाँ, गागरोन किले तक जाने और वापस आने का इंतजाम पहले करना समझदारी होगी। इस झालावाड़ बजट ट्रिप में पहला दिन किले और नदी के आसपास, जबकि दूसरा दिन शहर की विरासत और झालरापाटन के नाम रखिए।
बिना कार झालावाड़ कैसे पहुँचें?
राजस्थान पर्यटन के अनुसार झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर स्थित है और राजस्थान के कई शहरों से बसों के जरिए जुड़ा है। शहर में रेलवे स्टेशन भी है। अपने यहाँ से सीधी ट्रेन न मिले, तो कोटा होकर आने का विकल्प देख सकते हैं। टिकट लेने से पहले अपने दिन की बस या ट्रेन का समय जाँच लें, ताकि पहुँचते ही आगे की भागदौड़ न करनी पड़े।
ठहरने के लिए ऐसी जगह चुनें जहाँ से बाजार और स्थानीय सवारी तक आसानी से पहुँच सकें। सिर्फ सस्ता कमरा देखकर शहर से दूर रुकने पर बचत आने-जाने में खर्च हो सकती है। कमरा लेने से पहले सफाई, बाथरूम और कुल किराया पूछ लें। सुबह पहुँच रहे हों तो सामान रखने की सुविधा भी मालूम कर लें। छोटा बैग लेकर घूमना सुविधाजनक रहेगा।
पहला दिन: गागरोन किले के लिए समय निकालें

गागरोन किला इस यात्रा का मुख्य पड़ाव है। राजस्थान के आधिकारिक टिकट पोर्टल पर इसकी दूरी झालावाड़ से लगभग आठ किलोमीटर बताई गई है। शहर से निकलते समय ऑटो वाले से आने-जाने का किराया, रुकने का समय और वापसी की जगह साफ तय कर लें। साझा सवारी मिल जाए तो खर्च बाँट सकते हैं, लेकिन उसे पक्का मानकर योजना न बनाएँ।
गागरोन की खासियत इसके आसपास का प्राकृतिक बचाव है। आहू और कालीसिंध नदियों के संगम के पास बना यह दुर्ग पानी से सुरक्षित किलों का सुंदर उदाहरण है। इसे राजस्थान के छह पहाड़ी किलों के साथ वर्ष 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। सामने खड़ी दीवारें देखकर समझ आता है कि पुराने समय में किले की जगह चुनना भी कितनी बड़ी समझदारी का काम था।
यहाँ पहुँचकर जल्दी-जल्दी फोटो खींचकर लौटने की बजाय आराम से घूमिए। प्रवेश द्वार, खुले हिस्से और नदी की ओर दिखने वाले नजारे देखने के लिए करीब तीन घंटे अलग रखना अच्छा रहेगा। यह सुझाया गया समय है; आपकी चाल और रुचि के हिसाब से कम-ज्यादा हो सकता है। पैदल घूमना हो तो आरामदायक जूते पहनें और बीच-बीच में बैठकर सुस्ता लें।
पानी की बोतल और हल्का नाश्ता साथ रखें। धूप में घूमते समय छोटी-सी तैयारी काफी काम आती है। पुराने ढाँचे पर चढ़ने या बेहतर फोटो के लिए किनारों तक जाने से बचें। नदी देखने का आनंद सुरक्षित जगह से भी लिया जा सकता है। टिकट दर, खुलने का समय और अंदर वाहन ले जाने के नियम यात्रा से पहले आधिकारिक पोर्टल या टिकट खिड़की से जाँच लें।
दूसरा दिन: झालावाड़ और झालरापाटन की विरासत

दूसरे दिन की शुरुआत झालावाड़ के गढ़ पैलेस से रख सकते हैं। यह शहर के बीच स्थित ऐतिहासिक इमारत है। सरकारी संग्रहालय और भवानी नाट्यशाला भी शहर की विरासत को समझने के पड़ाव हैं। नाट्यशाला का निर्माण 1921 में हुआ था। निकलने से पहले इन जगहों के खुलने और प्रवेश की स्थिति पूछ लें, जिससे बंद दरवाजे देखकर वापस न लौटना पड़े।
इसके बाद झालरापाटन की तरफ निकलें। यहाँ का सूर्य मंदिर अपनी ऊँची बनावट और नक्काशी के लिए जाना जाता है। गोमती सागर के किनारे द्वारकाधीश मंदिर भी है। मंदिर देखने के बीच थोड़ा समय आसपास की गलियों के लिए रखें। चाय पीते हुए बाजार की रोजमर्रा की हलचल देखना भी ऐसी यात्रा का हिस्सा है। हर जगह पहुँचने की जल्दी करेंगे तो सैर थकान बन जाएगी।
चंद्रभागा मंदिर समूह को भी इसी दिन की योजना में जोड़ सकते हैं। राजस्थान पर्यटन के अनुसार यह झालावाड़ से लगभग सात किलोमीटर दूर, चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित है। पुराने स्तंभ और मंदिरों की बनावट देखने में दिलचस्प हैं। वापसी की बस या ट्रेन दोपहर में हो तो इस पड़ाव को छोड़ना बेहतर होगा; समय कम हो तो कम जगहों पर आराम से घूमिए।
झालावाड़ बजट ट्रिप में खर्च कैसे सँभालें?
दो दिन का खर्च आपके शहर से आने के किराए, कमरे और स्थानीय सवारी पर निर्भर करेगा। इसलिए किसी एक रकम को सबके लिए सही मानना ठीक नहीं है। पहले आने-जाने का टिकट और एक रात का कमरा तय करें, फिर ऑटो, भोजन और प्रवेश टिकट का खर्च जोड़ें। गागरोन की वापसी सहित किराया पहले तय करना खास तौर पर जरूरी है। दोस्त साथ हों तो साझा कमरा और सवारी खर्च हल्का कर सकते हैं।
बिना कार यात्रा का सबसे अच्छा तरीका है दिन में कम पड़ाव रखना। पहले दिन गागरोन को पूरा समय दें और दूसरे दिन वापसी के हिसाब से शहर तथा झालरापाटन घूमें। पानी, आरामदायक जूते और थोड़ा अतिरिक्त समय साथ रखेंगे तो दो दिन की यह सैर आराम से हो जाएगी।


